‘तुम आके लौट गये फिर भी हो यहीं मौजूद, तुम्हारे जिस्म की खुश्बू मेरे मकान में है’ : मुर्तजा हुसैन रहमानी

गोरखपुर: आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले कार्यक्रम में ‘अपने मेहनत के बलबूते सुख क साज सजावल जाई, पंचों जय जवान- जय किसान’ जैसी वाणी से परिचित लोगों के बीच से यह वाणी खामोश हो गयी। लेकिन ऐसे लगता कि रविन्द्र श्रीवास्तव जुगानी आज भी हमारे साथ हैं, तुम आके लौट गये फिर भी हो यहीं मौजूद, तुम्हारे जिस्म की खुश्बू मेरे मकान में है

उनके स्वर की गूंज दशकों तक खेत- खलिहान, चौपाल और गांव की पगडंडियों तक सुनाई देती थी। साथ ही गोरखपुर से प्रकाशित राष्ट्रीय सहारा में ‘बेंगुची चलल ठोकावे नाल‘ स्तंभ भी पाठकों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। उनका जीवन भोजपुरी भाषा के लिए समर्पित था।

रविन्द्र श्रीवास्तव जुगानी की यादें इस तरह है कि- ‘तुम आके लौट गये फिर भी हो यहीं मौजूद, तुम्हारे जिस्म की खुश्बू मेरे मकान में है’। उनकी वाणी और उनकी लेखनी हमेशा लोगों को प्रेरित करती रहेगी।

0 thoughts on “रविन्द्र श्रीवास्तव जुगानी भाई को विनम्र श्रद्धांजलि”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *