समाज का अंतिम व्यक्ति जीवन में कितना असहाय और असहजता महसूस करता है, आप सोच भी नहीं सकते। शासन प्रशासन कैसे जनसमस्याओं से आंखें बंद कर लेता है, इसी को परिभाषित करता अरविन्द रॉय का यह लेख एक बार आवश्य पढ़ना चाहिये
कोई बड़ा पेड़ नहीं गिरा है कि धरती हिल जाए। किसी बड़े नेता का निधन नहीं हुआ है कि शोक में सब कुछ बंद हो जाए। कोई बड़ा व्यक्ति भी मुद्दा नहीं है कि जन प्रतिनिधि, अधिकारी या उधोगपति दौड़ पड़ें। कोई घटना भी ऐसी नहीं हुई है जो मीडिया की सुर्खियां बन जाए। पर बात ऐसी है कि जिसे सुनकर दिल कांप जाए। आंखों में दृश्य उभरे तो शरीर में सिहरन पैदा हो जाए। व्यक्ति सोचने को मजबूर हो जाए कि यह स्थिति क्यों! इसका जिम्मेदार कौन!
बात 8 साल की एक बच्ची और उसकी उंगलियां पकड़े 75 साल के एक बुजुर्ग से जुड़ी है। मोबाइल मेरे पास था लेकिन तस्वीर नहीं ले सकता था क्योंकि विषय बच्ची थी। पर दादा-पौत्री का संवाद सुना। उनका एक-दूसरे के प्रति भाव देखा। उनकी मजबूरी देखी। आंख भर आईं। वक्त के हाथों मैं भी मजबूर था। मदद नहीं कर पाया। बेबस हो गया। खुद को बहुत धिक्कारा। पर दुबारा कह रहा हूं कि कुछ मदद नहीं कर पाया। इस बात का अफसोस है। शायद लंबे समय तक यह बात जेहन में बनी रहे। मुझे धिक्कारती रहे। मैं यह बात लिखना नहीं चाहता था लेकिन जरूरी है। ऐसे दृश्य रोज बनते होंगे। ऐसी मजबूरियां रोज खड़ी होती होंगी। सवाल भी करना है…इसका जिम्मेदार कौन!
अब घटना…
मुंशी प्रेमचंद पार्क में शुक्रवार की सुबह टहलने निकला था। टहलने के बाद पार्क से निकल कर पैदल घर की तरफ जा रहा था। ट्रांसपोर्ट नगर की तरफ से एक बच्ची अपने दादा के साथ पैदल चली आ रही थी। दादा ने उसकी उंगलियां पकड़ रखी थी। बुजुर्ग धीरे-धीरे चल रहे थे। बच्ची यह भांप ली थी। अचानक उसने ऑटो को देखकर हाथ दे दिया। दादा ने ऑटो के रुकते ही उसके चालक से जाने के लिए कह दिया। बच्ची ने कहा… बाबा!आप थक गए हैं। ऑटो में बैठ जाएं। दादा ने जेब में हाथ डाला। कुछ नोट निकाल कर देखा। फिर कहा…बेटी थोड़ी दूर है। पैदल ही चल लेंगे। अभी समय भी है। समय से पहुंच जाएंगे। उनकी बात सुनकर मैं रुक गया। सवाल किया…दादा कहां जाना है! बुजुर्ग ने बताया कि बेतियाहाता जा रहा हूं। पोती का आधार कार्ड बनवाना है। किराया देने के लिए पैसे कम हैं। आधार कार्ड बनवाना जरूरी है। बच्ची के स्कूल में मांगा जा रहा है।
मेंने अपने ट्रैकशूट की जेबें टटोली। खाली थीं। सुबह घर से निकलते समय ध्यान नहीं दिया कि पैसे नहीं रखे हैं। इधर-उधर देखा कि कोई परिचित दिख जाए। कोई जानने वाला गाड़ी लेकर ही आ जाए। कोई नहीं दिखा। मैंने कहा…दादा रुकें, मैं गाड़ी लेकर आता हूँ, छोड़ दूंगा। बुजुर्ग ने कहा…बेटा! मैं चला जाऊंगा। वह बेटी का हाथ थामे आगे बढ़ गए। यह स्थिति क्यों! मैंने खुद से सवाल किया। क्या प्रशासन स्कूलों पर आधारकार्ड बनाने की व्यवस्था नहीं कर सकता! क्या सरकार इस दिशा में पहल नहीं कर सकती। आखिर जब हमें आधार कार्ड बनवाना जरूरी है। सरकार चाहती है कि हम हर जगह आधार कार्ड लगाएं तो वह खुद बनवाए। गरीब को क्यों मारा जा रहा है! गरीब की गरीबी को क्यों धिक्कारा जा रहा है! गरीब की बेबसी का क्यों मजाक बनाया जा रहा है! कौन सुनेगा! कौन महसूस करेगा! कौन गरीबों के जख्मों पर मरहम नहीं लगाएगा तो उसे कुरेदकर और गहरा नहीं बनाएगा!
साहब!
आधार कार्ड अनिवार्य है तो समाज का अंतिम व्यक्ति का अपनी समस्याओं से कैसे जूझ रहा है इसको समझें और मुफ्त एवं घर-घर पहुंचकर बनवाने की व्यवस्था बने। सरकार-प्रशासन जिम्मेदारी ले। यह मेरा सुझाव है।
लेखक: अरविन्द राय वरिष्ठ पत्रकार,हिंदुस्तान
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