कानपुर। मोहम्मद उस्मान कुरैशी। रसूल-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद स.अ. के नवासे इमाम हुसैन अ.स. और उनके 72 साथियों की शहादत की याद में आज मुहर्रम का चाँद नज़र आते ही पूरे आलम-ए-इस्लाम में शोक की लहर दौड़ गई। हुसैनी फैडरेशन के मीडिया प्रभारी डॉ. ज़ुल्फिकार अली रिज़वी ने बताया कि हज़रत इमाम हुसैन ने कर्बला के मैदान में अपने परिजनों और साथियों के साथ इस्लाम और इंसानियत की रक्षा के लिए अपनी जान क़ुर्बान कर दी।

कानपुर शहर के लगभग पाँच हज़ार इमामबाड़ों को सजा कर अलम और ताजिये रखे गए हैं। चाँद रात से मजलिसें और नौहाख़्वानी शुरू हो गई है। शिया मुस्लिम महिलाओं ने कर्बला की विधवाओं की याद में चूड़ियाँ तोड़ीं।

मुख्य मुहर्रम जुलूसों की सूची निम्नलिखित है:

1 मुहर्रम: नवाब हैदर अली ख़ाँ और नवाब दुल्हा का अलम जुलूस

2 मुहर्रम: बाबा बदर अली का अलम बिसाती कब्रिस्तान

3 मुहर्रम: आशिक अली का जुलूस फूलवाली गली

4 मुहर्रम: हामिद व इस्माईल का अलम नई सड़क व खलासी लाइन

5 मुहर्रम: शाह बिरादरान व मटरू का जुलूस कर्नेलगंज

6 मुहर्रम: रायनी बिरादरी का अलम परेड

7 मुहर्रम: मेंहदी जुलूस नवाब हैदर अली ख़ाँ, बाबूपुरवा

8 मुहर्रम: मन्नती अलम – जाफरिया, मकबरा

9 मुहर्रम: कुली बाज़ार – बड़ा बूचड़खाना

10 मुहर्रम (यौमे आशूरा): शहर के हर मुस्लिम इलाके से जुलूस छोटी कर्बला (ग्वालटोली) और बड़ी कर्बला (नवाबगंज) तक पहुंचते हैं।

डॉ. रिज़वी ने बताया कि चमनगंज हाशमी तिराहा और बाबूपुरवा सहित शहर भर में 10 दिनों तक मजलिसें और तकरीरें होंगी, जिनमें उलेमा-ए-इकराम कर्बला की त्रासदी और इमाम हुसैन की कुर्बानी पर रौशनी डालेंगे।

चाँद रात की मजलिस में वक्ता ज़ोहर-ए-कैन ने कहा कि 61 हिजरी के बाद मोहर्रम का चाँद शोक और बलिदान की पहचान बन गया। यज़ीद की बैअत को ठुकरा कर इमाम हुसैन ने दीन-ए-मोहम्मदी की हिफाज़त की और अपने खून से इस्लाम को ज़िंदा रखा।

इस बयान को सुनकर मजलिस में मौजूद लोगों की आंखों से अश्क बह निकले।